कजोड़ मल मीना
संपादक हैलो सरकार
नई दिल्ली / बैंकॉक : आपको मालूम होगा दुनिया जिसे 21वीं सदी का डिजिटल युग कह रही है, उसी तकनीक की आड़ में म्यांमार, थाईलैंड और लाओस की सीमाओं पर ‘ठगी का एक खूनी साम्राज्य’ खड़ा हो चुका है, जिसका तोड़ विश्व के बड़े बड़े देशों के पास भी नहीं है। जी, हां यह बात पूरी सोलह आने सही है कि म्यांमार के भीतर चल रहे इन अवैध साइबर ठगी के अड्डों ने आज एक ऐसा भयानक रूप ले लिया है, जिसने दुनिया के कई देशों के हजारों मासूम नागरिकों को ‘आधुनिक बंधक’ (मॉडर्न स्लेव्स) बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के एक चौंकाने वाले और डराने वाले अनुमान के मुताबिक, म्यांमार के इन स्कैम सेंटरों में 1 लाख से ज्यादा लोग अपनी इच्छा के खिलाफ, बंदूक की नोक पर काम करने को मजबूर हैं।

साधारण फ्रॉड नहीं, बहुत बड़ा नेटवर्क
विश्व के सभी देशों को इस बात को भली-भांति समझ लेना चाहिए कि यह कोई साधारण फ्रॉड नेटवर्क नहीं है। म्यांमार-थाईलैंड सीमा के म्यावाडी इलाके में स्थित ये स्कैम सेंटर असल में भारी सुरक्षा वाले ‘हाई-सिक्योरिटी कंपाउंड’ हैं। इन्हें स्थानीय सशस्त्र मिलिशिया (आतंकी गुटों) के संरक्षण में चीनी माफिया द्वारा चलाया जा रहा है। ‘केके पार्क’ और ‘श्वे कोक्को’ जैसे इलाके आज वैश्विक अपराध और मानव तस्करी के सबसे कुख्यात केंद्र बन चुके हैं।
नौकरी का झांसा देकर करते हैं अपहरण और बिजली के लगाते है झटके !!
नौकरी की तलाश में भटक रहे युवकों की इस नरक की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। युवाओं को विदेशों में (जैसे बैंकॉक में) ₹70,000 प्रति माह वाली कॉल सेंटर की नौकरियों का लालच देकर बुलाया जाता है, और फिर उन्हें म्यांमार के इन अड्डों पर अगवा कर लिया जाता है। टारगेट पूरा न होने पर यातनाएं देते है। यदि ये बंधक मासूम लोगों से साइबर धोखाधड़ी करने का लक्ष्य (Target) पूरा नहीं कर पाते, तो उन्हें बिजली के झटके दिए जाते हैं, बर्बरता से पीटा जाता है और भूखा रखा जाता है।

रिहाई के बदले मांगते हैं मोटी फिरौती
गौरतलब है कि महाराष्ट्र के नासिक के रहने वाले 30 वर्षीय कौस्तुभ शेजवाल, उत्तर प्रदेश के मोहम्मद उस्मान अंसारी व मोहम्मद हसन रजा, और बिहार के अनुरंजन कुमार जैसे सैकड़ों युवाओं ने वीडियो जारी कर अपनी जान बचाने की गुहार लगाई है। अपहरणकर्ताओं द्वारा उनकी रिहाई के बदले 8 लाख रुपये तक की फिरौती मांगी जा रही है। ‘सिविल सोसाइटी नेटवर्क फॉर ह्यूमन ट्रैफिकिंग विक्टिम असिस्टेंस’ के आंकड़ों के अनुसार, कई बार की गई बड़ी कार्यवाहियों के बावजूद इन अड्डों में 5300 से ज्यादा विदेशी नागरिक आज भी तड़प रहे हैं। यह एक वैश्विक मानवीय संकट है क्योंकि इसमें किसी एक देश के नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के नागरिक फंसे हैं जिनमें मुख्य रूप से करीब 1,600 चीनी, करीब 200 बर्मी, 20 थाई नागरिकों के अलावा भारत, फिलीपींस, ताइवान, मलेशिया, ब्राजील, रूस, केन्या, युगांडा, रवांडा और जिम्बाब्वे जैसे देशों के नागरिक भी इन यातना गृहों में कैद हैं। अकेले म्यांमार के इन अड्डों पर 800 से 1000 भारतीयों के फंसे होने की आशंका है।
अब तक का रेस्क्यू ऑपरेशन और वैश्विक दबाव
हालांकि संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक स्तर पर बढ़ते दबाव के बाद म्यांमार प्रशासन ने इस अरबों डॉलर के काले साम्राज्य (अवैध आपराधिक उद्योग) पर कार्रवाई शुरू की है। भारत सरकार, विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की मुस्तैदी के कारण पिछले डेढ़-दो वर्षों में म्यांमार, कंबोडिया और लाओस के इन नरक जैसे स्कैम केंद्रों से 2400 से अधिक भारतीयों को सुरक्षित वापस लाया जा चुका है।
विश्व के सभी युवाओं का सबसे बड़ा सवाल
क्या दुनिया की महाशक्तियां और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इस आधुनिक गुलामी और संगठित साइबर आतंक पर मूकदर्शक बने रहेंगे? यदि हां तो कब तक ?
अब देखना होगा कि जब तक चीनी माफिया और म्यांमार के आतंकी गुटों के इस गठजोड़ को जड़ से खत्म नहीं किया जाता, तब तक दुनिया का कोई भी युवा सुरक्षित नहीं है। यह समय केवल चिंता जताने का नहीं, बल्कि एक निर्णायक और संयुक्त वैश्विक सैन्य व रणनीतिक कार्रवाई का है! यह समाचार पूरी दुनिया के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ (चेतावनी) है। जब तक इंटरनेट पर बैठे इन चीनी माफियाओं और म्यांमार के सशस्त्र आतंकी गुटों के गठजोड़ को जड़ से जमींदोज नहीं किया जाता, तब तक दुनिया का हर वो युवा असुरक्षित है जो एक बेहतर भविष्य की तलाश में घर से निकलता है। अब समय सिर्फ बैठकों का नहीं, बल्कि इन हाई-सिक्योरिटी कंपाउंड्स पर सीधी और निर्णायक वैश्विक कार्रवाई का है!
