मीनेश चन्द्र मीना
हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख
जयपुर। किसानों की पीड़ा को ध्यान में रखते हुए राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एक ऐसा ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाया है जिससे देश के करोड़ों किसानों की किस्मत और उनके हक को लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का रास्ता साफ हो गया। हाई कोर्ट की सख्ती के बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया। अदालत ने सीधे तौर पर सरकारों को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा है कि जब फसलों को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदने का कानूनी प्रावधान मौजूद है, तो उसे जमीन पर लागू क्यों नहीं किया जा रहा ?

सरकार से नाराज़ हैं हाई कोर्ट
गौरतलब है कि पिछले 7 साल से सरकार की ‘खामोशी’ पर कोर्ट सख्त रवैया अपनाते हुए चेतावनी दी गई। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि केंद्र सरकार को इस मामले में साल 2019 में ही नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन आज तक पिछले 7 साल में सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया है। अदालत ने अब इस मामले में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) को जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका दिया है।
भारतीय खाद्य निगम और राजफैड को पक्षकार बनाने के निर्देश
आपकों बता दें, सरकार ने जानबूझकर FCI और राजफैड पक्षकार नहीं बनाने पर नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि केवल सरकारों को ही नहीं, बल्कि FCI (भारतीय खाद्य निगम) और राजफैड को भी इस मामले में पक्षकार बनाने के कड़े निर्देश दिये है।

करोड़ों का नुकसान, जवाबदेह कौन ?
राजस्थान हाई कोर्ट ने रामपाल जाट की जनहित याचिका में इस बात का खुलासा किया गया है कि राजस्थान में साल 2012 के बाद बाजरे की खरीद न होने से किसानों को भारी घाटा हुआ है। मक्का, मूंग और चना जैसी फसलों के नुकसान का भी हवाला दिया गया है। हाई कोर्ट ने याद दिलाया कि कोर्ट ने पूर्व में 2019 में सुनवाई करते हुए केंद्र व राज्य सरकार को MSP पर खरीद की श्रेष्ठतम नीति और उसके क्रियान्वयन (Implementation) पर सुझाव देने को कहा था। लेकिन सरकार हर बार सिर्फ समय मांगती रही। अब कोर्ट के तेवर साफ कर रहे हैं कि किसानों के हक के साथ यह ढिलाई अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस मामले की सुनवाई 30 जुलाई को तय की गई है। देखना यह होगा कि कोर्ट के इस ‘अंतिम अल्टीमेटम’ के बाद सरकार के पास क्या जवाब होता है। यह फैसला आने वाले समय में देश के कृषि ढांचे और किसान आंदोलन की दिशा बदल सकता है।