पुलिस की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट ने चलाया डंडा, पुलिस तंत्र में मची खलबली

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कजोड़ मल मीना
एडवोकेट, राजस्थान उच्च न्यायालय

नई दिल्ली : भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली और मानवाधिकारों के इतिहास में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी फैसला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम और कड़े फैसले में पुलिस की मनमानी पर खुलासा करती हुए स्पष्ट कर दिया है कि  किसी भी नागरिक को पूछताछ या जांच के नाम पर पुलिस घंटों या कई दिनों तक ‘बफर जोन’ में नहीं रख सकती। किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के साथ ही उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा उसी पल से शुरू हो जाएगी, जब पुलिस ने उसे पकड़ा है। पुलिस अब कागजों पर गिरफ्तारी की तारीख और समय बदलकर इस समयासीमा को छिपा नहीं सकती।



जी हां, यह बात पूरी सौलह-आने सही है। यह सनसनीखेज खुलासा तब सामने आया जब त्रिपुरा हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ तीन आरोपियों की अपील पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने पुलिस और जांच एजेंसियों की मनमानी पर गंभीर सवाल खड़े किए।

पुलिस की मनमानी और कागजी हेरफेर पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी चोट

क्या था पूरा मामला? पर्दे के पीछे का खेल आया सामने
यह पूरा मामला त्रिपुरा में एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम से जुड़ा हुआ था। आरोपियों को जब्ती और तलाशी के दौरान हिरासत में तो ले लिया गया, लेकिन पुलिस ने उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन दिखाई। पुलिस का पुराना ढर्रा यही रहा है कि जब तक कागजी गिरफ्तारी दर्ज न हो, तब तक 24 घंटे की गिनती शुरू नहीं होती। इसी तकनीकी loopholes (कमियों) का फायदा उठाकर पुलिस अक्सर शुरुआती घंटों में मनमाने तरीके से पूछताछ और कथित तौर पर थर्ड-डिग्री का सहारा लेती थी।



अब नहीं चलेगा ‘बफर जोन’ का खेल!

गौरतलब है कि जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने इस खेल पर हमेशा के लिए लगाम लगा दी है। अदालत ने साफ कर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत ‘हिरासत’ (Detention) और ‘गिरफ्तारी’ (Arrest) में कोई फर्क नहीं है। स्वतंत्रता छिनने का मतलब ही घड़ी की सुई का चलना शुरू होना है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 5 बड़ी और चौंकाने वाली बातें :

1. बचाव का कोई रास्ता नहीं : तलाशी, जब्ती या पूछताछ में बिताया गया एक-एक सेकंड 24 घंटे की कुल सीमा में गिना जाएगा। केवल अदालत तक पहुंचने का वास्तविक समय ही इसमें छूट पाएगा।
2. मजिस्ट्रेट अब नहीं रहेंगे मूकदर्शक : अब मजिस्ट्रेट की यह सख्त जिम्मेदारी होगी कि वे आरोपी को पेश करते समय हिरासत की वास्तविक तारीख और समय दर्ज करें। यदि 24 घंटे का उल्लंघन हुआ, तो बिना किसी कागजी बहाने के आरोपी को तत्काल रिहा करना होगा।
3. हाईकोर्टों के पुराने फैसलों को नकारा : सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के उन पुराने फैसलों को भी खारिज कर दिया, जो पुलिस को हिरासत के शुरुआती घंटों को गणना से बाहर रखने की अनुमति देते थे।
4. व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि : अदालत ने यह संदेश दे दिया है कि अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, कानून की प्रक्रिया और संविधान की धज्जियां उड़ाने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।



पुलिस की कार्यशैली पर सीधा न्यायिक पहरा

यह फैसला उन तमाम मामलों में एक बड़ा तमाचा है जहां खाकी की ताकत के आगे आम नागरिक की स्वतंत्रता और मानवाधिकार दम तोड़ देते थे। अब इस फैसले के बाद पुलिस की कार्यशैली पर सीधा न्यायिक पहरा बैठ गया है, जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों को एक मजबूत सुरक्षा कवच मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा भारत के सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों के पास इस निर्णय की प्रति को सर्कुलेट करने के लिए निर्देश दिए हैं।
अब देखना होगा कि क्या पुलिस तंत्र में सुधार लाने के लिए राज्य के पुलिस प्रमुख इस फैसले पर कितना अमल करते हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। बहरहाल, खाकी वर्दी की मनमानी पर यह तमाचा एक गंभीर सवाल पैदा करता है।

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