राजस्थान हाईकोर्ट का फर्जी फरमान, विधायक पुत्र पर FIR, हरियाणा के बैंक मैनेजर तक पहुंची जांच की आंच, WhatsApp पर कैसे रचा गया कथित खेल?

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मीनेश चंद्र मीना
हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख

जयपुर। पंचायत चुनाव में एंट्री के लिए हाईकोर्ट के नाम पर कथित फर्जी आदेश का इस्तेमाल करने का मामला गरमाया। कांग्रेस विधायक श्रवण कुमार के बेटे जयप्रकाश और उनके सहयोगी उमेश कुमार के खिलाफ FIR दर्ज। अदालत ने मूल रिकॉर्ड खंगाला तो सामने आया कि 16 अक्टूबर को ऐसा कोई अंतरिम आदेश जारी ही नहीं हुआ था। अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल—कथित फर्जी आदेश तैयार किसने किया और इसके पीछे कौन-कौन शामिल था?



हाई कोर्ट हुआ चौकन्ना

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के सूरजगढ़ में पंचायत चुनाव से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था से लेकर न्यायिक प्रक्रिया तक कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि पंचायत समिति का चुनाव लड़ने के लिए मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की कोशिश के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट के नाम पर कथित फर्जी आदेश सामने रखा गया। यह खबर  आग की तरह फैल गई और हाईकोर्ट  चौकन्ना हो गया।



इस मामले में सूरजगढ़ से कांग्रेस विधायक श्रवण कुमार के बेटे जयप्रकाश के खिलाफ FIR दर्ज हुई है। इतना ही नहीं, जांच की कड़ी हरियाणा के झज्जर जिले तक जा पहुंची है। उमेश कुमार नाम के व्यक्ति को भी मुकदमे में नामजद किया गया है। आरोप है कि उसी ने कथित फर्जी आदेश एसडीएम को WhatsApp किया था।

अब सवाल सिर्फ एक कथित फर्जी आदेश का नहीं, बल्कि उस पूरे घटनाक्रम का है, जिसमें अदालत का नाम, चुनावी प्रक्रिया और प्रशासनिक अधिकारियों को भेजा गया WhatsApp संदेश एक साथ चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।



वोटर लिस्ट में नाम नहीं था, चुनाव लड़ने की राह में अड़चन

दरअसल, पूरे विवाद की शुरुआत मतदाता सूची से हुई। सूरजगढ़ विधायक श्रवण कुमार के बेटे जयप्रकाश का नाम सूरजगढ़ नगर पालिका के वार्ड नंबर 25 की मतदाता सूची में दर्ज था। लेकिन उनकी मंशा सूरजगढ़ पंचायत समिति के वार्ड नंबर 7 से चुनाव लड़ने की थी। इसके लिए जीणी ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में नाम होना जरूरी था।

बताया गया कि चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद निर्वाचन आयोग ने ग्रामीण मतदाता सूची फ्रीज कर दी थी। ऐसे में जयप्रकाश ने नाम जुड़वाने के लिए आवेदन किया, लेकिन निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के कारण बूथ लेवल ऑफिसर ने नाम जोड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद 15 अक्टूबर 2026 को जयप्रकाश ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।



16 अक्टूबर को याचिका पर सुनवाई हुई, लेकिन अदालत ने न तो मतदाता सूची में नाम जोड़ने की अनुमति दी और न ही चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल करने का कोई अंतरिम आदेश पारित किया। अगली सुनवाई के लिए 27 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की गई। लेकिन इसी दिन कहानी में नया मोड़ आ गया।

अदालत ने राहत नहीं दी, फिर एसडीएम के सामने कैसे पहुंचा आदेश?

16 अक्टूबर को ही जयप्रकाश पंचायत समिति के वार्ड नंबर 7 से कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल करने सूरजगढ़ एसडीएम कार्यालय पहुंच गए।

एसडीएम एवं रिटर्निंग अधिकारी संदीप चौधरी के अनुसार, जयप्रकाश ने बताया कि हाईकोर्ट ने उन्हें राहत दे दी है और मतदाता सूची में नाम जोड़ने के साथ चुनाव लड़ने की अनुमति भी मिल गई है।

उन्होंने बताया कि आदेश की कॉपी उनके सहयोगी के WhatsApp पर आई है।

कुछ ही देर बाद एसडीएम के WhatsApp पर भी कथित हाईकोर्ट आदेश की प्रति पहुंच गई। उसमें दावा किया गया था कि अदालत ने जयप्रकाश का नाम जीणी ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में बहाल करने और उन्हें नामांकन दाखिल करने की अनुमति दे दी है।

लेकिन प्रशासन ने इस दस्तावेज को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसकी प्रमाणिकता की पुष्टि करने का फैसला किया।

जिला कलेक्टर कार्यालय और राज्य निर्वाचन आयोग से मार्गदर्शन लिया गया। जयप्रकाश को नोटिस जारी कर हाईकोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति यानी सर्टिफाइड कॉपी जमा कराने के निर्देश दिए गए।

एसडीएम के मुताबिक, नोटिस के बावजूद प्रमाणित प्रति जमा नहीं कराई गई। आखिरकार मतदाता सूची में नाम नहीं होने के कारण उनका नामांकन खारिज कर दिया गया।

हरियाणा के उमेश तक पहुंची जांच की कड़ी

इस मामले में सबसे अहम सवाल था कि कथित फर्जी आदेश एसडीएम तक पहुंचा कैसे? पुलिस जांच के शुरुआती विवरण के मुताबिक, जिस मोबाइल नंबर से आदेश WhatsApp किया गया था, वह हरियाणा के नारनौल में उमेश कुमार के नाम से रजिस्टर्ड बताया गया है।

नंबर के अंतिम चार अंक 8485 बताए गए हैं।

गौर तलब है कि उमेश मूल रूप से हरियाणा के झज्जर जिले के गांव गोरिया का रहने वाला है और पहले चिड़ावा के एक बैंक में तैनात था। इसी दौरान उसकी पहचान विधायक पुत्र जयप्रकाश से होने की बात सामने आई है।

अब पुलिस के सामने कई अहम सवाल हैं—

– क्या उमेश ने केवल कथित आदेश आगे भेजा था?
– क्या उसे दस्तावेज की वास्तविकता की जानकारी थी?
– कथित आदेश तैयार करने में उसकी कोई भूमिका थी?
– जयप्रकाश और उमेश के बीच इस मामले में क्या बातचीत हुई थी?
– क्या इस पूरे घटनाक्रम में अन्य लोग भी शामिल थे?

इन सवालों के जवाब फिलहाल जांच के दायरे में हैं। केवल मोबाइल नंबर के रजिस्ट्रेशन से किसी व्यक्ति की कथित जालसाजी में भूमिका साबित नहीं होती।

हाईकोर्ट में खुला कथित फर्जी आदेश का राज

मामले ने 29 अक्टूबर को राजस्थान हाईकोर्ट में नया मोड़ लिया। जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ के सामने राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अधिवक्ता अमित कुरी ने सूरजगढ़ एसडीएम संदीप चौधरी का पत्र और कथित फर्जी आदेश की प्रतियां पेश कीं।

अदालत ने जब इस आदेश का मूल न्यायिक रिकॉर्ड से मिलान किया तो सामने आया कि 16 अक्टूबर को ऐसा कोई अंतरिम आदेश पारित ही नहीं किया गया था।

यानी जिस आदेश के आधार पर राहत मिलने का दावा किया जा रहा था, उसका अदालत के मूल रिकॉर्ड में अस्तित्व नहीं मिला।

इस घटनाक्रम को अदालत ने गंभीरता से लिया। न्यायिक व्यवस्था पर हमले से जुड़ी गंभीर टिप्पणी करते हुए रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) को तीन दिन में जांच रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए।

अब यह मामला केवल पंचायत चुनाव में नाम जुड़वाने के विवाद तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि अदालत के नाम पर कथित फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उसके इस्तेमाल के आरोपों की जांच का विषय बन गया।

FIR में विधायक पुत्र और सहयोगी दोनों नामजद

हाईकोर्ट में मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने भी कार्रवाई की। जिला कलेक्टर झुंझुनूं के निर्देश पर सूरजगढ़ एसडीएम एवं रिटर्निंग अधिकारी संदीप चौधरी की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया।

सूरजगढ़ थाना प्रभारी राम सिंह यादव के मुताबिक, FIR में जयप्रकाश पुत्र श्रवण कुमार, उमेश कुमार और अन्य सहयोगियों को नामजद किया गया है। मामले में कथित जाली दस्तावेज तैयार करने, उनका इस्तेमाल करने, जालसाजी और धोखाधड़ी से संबंधित आरोप शामिल हैं।

पुलिस का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण में है। पूछताछ के बाद ही स्पष्ट होगा कि कथित फर्जी आदेश कैसे तैयार हुआ, किसने तैयार किया और उसमें किन लोगों की क्या भूमिका रही।

FIR के बाद फोन बंद, वकील ने भी जताई अनभिज्ञता

मामला सामने आने के बाद जयप्रकाश ने कथित फर्जी आदेश भेजने के आरोपों से इनकार किया था। उनका कहना था कि उन्होंने नामांकन के साथ कोई फर्जी आदेश संलग्न नहीं किया।

वहीं, जयप्रकाश की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले जयपुर के अधिवक्ता कपिल गुप्ता ने भी कथित फर्जी आदेश की जानकारी होने से इनकार किया।

उनके मुताबिक, उन्होंने इस मामले में पुलिस कमिश्नर और हाईकोर्ट प्रशासन से जांच कर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

विधायक पिता बोले—बेटे को फंसाने की साजिश

दूसरी ओर, विधायक श्रवण कुमार ने पूरे मामले को राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया है। उनका कहना है कि जयप्रकाश ने जो नामांकन दाखिल किया, उसके साथ लगाए गए दस्तावेजों में ऐसा कोई हाईकोर्ट आदेश शामिल नहीं था। विधायक ने दावा किया कि उनके पास इसका पूरा रिकॉर्ड मौजूद है।

उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब बेटे का नाम मतदाता सूची में नहीं था तो एसडीएम ने नामांकन फॉर्म जमा ही क्यों किया?

विधायक ने यह भी सवाल उठाया कि जब नामांकन दाखिल करने की अंतिम समयसीमा दोपहर तीन बजे थी, तो 3 बजकर 18 मिनट पर WhatsApp पर पहुंची किसी तस्वीर की क्या वैधता हो सकती है?



उमेश कुमार से संबंधों के सवाल पर उन्होंने कहा कि उमेश पहले चिड़ावा में बैंक में तैनात था और वे उसे जानते हैं। उनके मुताबिक, पूरे मामले को उनके बेटे के खिलाफ षड्यंत्र के रूप में पेश किया जा रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल—कथित आदेश का असली मास्टरमाइंड कौन?

इस पूरे घटनाक्रम में कई अहम कड़ियां अभी जुड़नी बाकी हैं।

एक तरफ हाईकोर्ट के मूल रिकॉर्ड में कथित आदेश नहीं मिलने की बात सामने आई है। दूसरी तरफ उसी आदेश की प्रति एसडीएम तक WhatsApp के जरिए पहुंचने का आरोप है। मोबाइल नंबर उमेश कुमार के नाम पर रजिस्टर्ड बताया जा रहा है, जबकि विधायक श्रवण कुमार इसे अपने बेटे के खिलाफ साजिश बता रहे हैं।

ऐसे में जांच के केंद्र में अब तीन बड़े सवाल हैं—

1. कथित फर्जी आदेश तैयार किसने किया?
2. उमेश कुमार को उस दस्तावेज की वास्तविकता की जानकारी थी या वह केवल उसे आगे भेजने वाला व्यक्ति था?
3. जयप्रकाश को कथित आदेश की जानकारी और उसके इस्तेमाल से जुड़े घटनाक्रम में क्या भूमिका रही?

फिलहाल FIR दर्ज होना आरोपों की जांच की शुरुआत है, दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं। पुलिस की जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही इन सवालों के जवाब सामने आएंगे।

एक चुनावी नामांकन से शुरू हुआ यह विवाद अब कथित न्यायिक दस्तावेज की जालसाजी, WhatsApp संदेशों और हरियाणा से राजस्थान तक फैले संपर्कों की जांच में बदल चुका है। सबसे अहम सवाल यही है—अदालत के नाम पर कथित आदेश बनाने और उसे प्रशासन तक पहुंचाने के पीछे आखिर पूरी कहानी क्या है?

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