आखिर गरीबों का मजा़क क्यों करती है सरकार ? ‘तबादला फेक्ट्री’ के काले कारनामे

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मीनेश चन्द्र मीना
   हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख


  जयपुर। काफी समय से बाट जोह रहे कर्मचारियों को को लग रहा था कि तबादलों पर लगी रोक हटी तो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का ईलाज कराया जा सकेगा और जीने के लिए नई जिंदगी मिल सकेगी। परन्तु राजस्थान में तबादलों की आंधी क्या चली, सिस्टम की संवेदनशीलता ही उड़ गई! सरकार ने बड़े-बड़े वादे किए थे कि विधवा, परित्यक्ता, दिव्यांग और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे कर्मचारियों को राहत दी जाएगी और उनके घर के पास पोस्टिंग मिलेगी। लेकिन धरातल पर जो हुआ, उसने सबको झकझोर कर रख दिया है।



जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे लोगों की आस को लगी नजर

गौरतलब हैं कि कैंसर पीड़ितों और बेसहारा विधवा महिलाओं को सैकड़ों किलोमीटर दूर फेंक दिया गया, वहीं दूसरी तरफ सत्ता के रसूख की एक ऐसी मिसाल देखने को मिली जिसने ‘नियम-कायदों’ का मखौल उड़ा कर रख दिया।
मजेदार बात यह मंत्री पुत्र के लिए 4 घंटे में बदला नियम तो जनता हैरान सी रह गई। पूरा मामला कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत के बेटे दीपक से जुड़ा है, जो सहायक प्रोग्रामर के पद पर कार्यरत हैं।

जोराराम कुमावत मंत्री राजस्थान सरकार


आपकों बता दें, 9 जुलाई को दीपक का तबादला सुमेरपुर (पाली) से 60 किलोमीटर दूर सांचौर जालोर कर दिया गया था। लेकिन रसूखात का जादू चला कि अभी आदेश की स्याही सूखी भी नहीं थी कि महज 4 घंटे के भीतर ऊपर से अदृश्य दबाव आया और तबादला तुरंत निरस्त कर दिया गया! दीपक को वापस सुमेरपुर में ही तैनात कर दिया गया।
बेकाबू सोशल मीडिया पर अब यह सवाल आग की तरह फै़ैल रहा है कि क्या आम जनता और रसूखदारों के लिए कानून अलग-अलग हैं?
इस सवाल के जवाब पर भजन लाल शर्मा की सरकार मौन धारण का व्रत कर लिया।

अपनों को ‘राहत’ और पीड़ितों को ‘आफत’—आदेश कुछ और, खेल कुछ और!

शिक्षा विभाग सहित अन्य विभागों ने सरकार की गाइडलाइंस को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। इन हैरान करने वाले मामलों को बानगी देखिए :—

कैंसर पीड़ित पर सितम : शाहपुरा में तैनात एक कैंसर पीड़ित वरिष्ठ अध्यापक को राहत देने के बजाय कोटपूतली-बहरोड़ ट्रांसफर कर दिया गया।

विधवा शिक्षिका के साथ क्रूर मजाक : एक बेसहारा विधवा शिक्षिका को सीकर से झुंझुनू भेज दिया गया, जबकि सरकार की प्राथमिकता उन्हें राहत देने की थी।

बैकडेट का खेल: एक प्रिंसिपल का तबादला सामोद से डेहरा जयपुर किया गया और बाद में बैकडेट (पुरानी तारीख) में फेरबदल कर उन्हें सीकर लगा दिया गया।

पुरस्कृत शिक्षक भी परेशान: एक सम्मानित और पुरस्कृत शिक्षक को झोटवाड़ा से सीधे झालावाड़ भेजने के आदेश जारी कर दिए गए, जिसके खिलाफ अब वे कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं।

अब कोर्ट की शरण में पीड़ित कर्मचारी

पीड़ित कर्मचारियों का आरोप है कि विभागों ने इन विशेष श्रेणियों के लिए न तो कोई अलग व्यवस्था बनाई और न ही पारदर्शी तरीके से आवेदन मांगे। सिस्टम की इस मनमानी से तंग आकर अब बड़ी संख्या में प्रभावित कर्मचारी कोर्ट और राजस्थान सिविल सेवा अधिकरण (RAT) की शरण में पहुंच रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल : क्या संवेदनशील सरकार के दावों के बीच, रसूखदारों के लिए पलकें बिछाने और लाचारों को दूर भगाने वाले अफसरों पर कोई कार्रवाई होगी? या फिर नियमों की यह बलि ऐसे ही चढ़ती रहेगी?

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