कजोड़ मल मीना
नई दिल्ली। “नाम में ‘राम’ होने से कोई भगवान नहीं बन जाता!” जी हां, यह बात पूरी सोलह आने सही है। अभी हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले में ऐसी टिप्पणी आने से पूरे न्याय जगत में तहलका मच गया।
18 साल पुराने केस में सबसे बड़ा धमाका!
अदालत ने कहा— नाम से नहीं, कर्मों से तय होती है इंसान की औकात! रेप-अपहरण के आरोपी ‘रामचंदर’ को कोर्ट ने बरी कर दिया।
अदालत में गूंजा वो सच, जिसे कहने से सब डरते हैं!
क्या किसी का नाम ‘राम’ होने से वह दूध का धुला हो जाता है? या नाम में ‘मोहम्मद’ लग जाने से उसकी नीयत तय हो जाती है? दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसकी गूँज कई सालों तक कानून के गलियारों में सुनाई देगी।

अदालत ने सख्त लहजे में कहा
“उत्तर भारत में बच्चों का नाम ‘राम’ रखना कोई नई बात नहीं है, वैसे ही जैसे कई मुस्लिम परिवारों में नाम ‘मोहम्मद’ होता है। लेकिन नाम किसी के चरित्र का प्रमाण पत्र नहीं होता! यह कलयुग है… यहाँ नाम ‘रामचंदर’ रख लेने भर से कोई मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम नहीं बन जाता!”
इंसानी फितरत और नाम के बीच के ढोंग को बेनकाब करते हुए हाई कोर्ट ने यह ऐतिहासिक टिप्पणी उस वक्त की, जब वह 18 साल पुराने एक बेहद संगीन मामले पर फैसला सुना रहा था।
18 साल की तबाही… और आखिर में ‘ज़ीरो’ साबित हुआ केस!
पुलिस की ऐसी लापरवाही हुई जिसके कारण पीड़िता को 18 साल केस लड़ने के बावजूद हार मुंह देखना पड़ा।
मामला साल 2006 का है। एक 13 साल की नाबालिग लड़की के अपहरण और दुष्कर्म के आरोप में रामचंदर नाम के शख्स को सलाखों के पीछे धकेल दिया गया। सालों-साल मुकदमा चला, जिंदगी बर्बाद हुई… लेकिन जब हाई कोर्ट ने फाइलों के पन्ने पलटे, तो पुलिस और अभियोजन पक्ष (Prosecution) की थ्योरी की धज्जियां उड़ गईं।

झूठ की नीव पर टिका केस :—
सरकारी पक्ष की गवाहियों में इतने बड़े विरोधाभास थे कि कोर्ट का माथा ठनक गया।
पीड़िता का यू-टर्न :—
पीड़ित लड़की ने अदालत के सामने खड़े होकर साफ कह दिया— “मुझे आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं चाहिए!”
मर्जी का खेल :—
आरोपी शुरू से चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि लड़की बालिग थी और अपनी मर्जी से उसके साथ गई थी, नतीजा यह हुआ कि सबूतों ने भी इसी सच पर मुहर लगाई।
इंसाफ की सबसे बड़ी जीत : —
नाम का आभामंडल ध्वस्त, आरोपी बाइज्जत बरी! हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि अदालतें नाम के प्रभाव या पुलिस की गढ़ी हुई कहानियों पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों के आधार पर चलती हैं। अभियोजन पक्ष आरोपी का जुर्म साबित करने में बुरी तरह नाकाम रहा, जिसके बाद कोर्ट ने रामचंदर को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए बेदाग बरी कर दिया।
सबक बिल्कुल साफ है :—
कलयुग में नाम के पीछे छिपकर न तो कोई गुनाह छुपाया जा सकता है, और न ही सिर्फ ‘नाम’ के आधार पर किसी निर्दोष को ताउम्र गुनहगार माना जा सकता है।