मीनेश चन्द्र मीना
हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का सख्त रुख कि अगर परिवार में पहले से वैध सर्टिफिकेट मौजूद है, तो अधिकारियों को बच्चों का जाति प्रमाण पत्र 60 दिनों के भीतर जारी करना होगा।
पिता के पास जाति प्रमाण पत्र है तो बच्चों का भी बनाएं
जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए दशकों पुराने कागज़ात जुटाने की उलझन और प्रशासनिक अड़ंगों का सामना कर रहे हज़ारों परिवारों के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक राहत भरा और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि परिवार के पास पहले से वैध जाति प्रमाण पत्र मौजूद है, तो महज 1950 के पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध न होने का बहाना बनाकर बच्चों को कास्ट सर्टिफिकेट देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला ?
बिलासपुर के निवासी निष्ठा बघेल और अभय बघेल ने अपने जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था। लेकिन अधिकारियों ने यह कहकर उनका आवेदन अटका दिया कि उनके पास वर्ष 1950 का रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
अधिकारियों की इस मनमानी और प्रशासनिक लालफीताशाही से तंग आकर आवेदकों ने एडवोकेट डॉ. प्राची दीवान के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में स्पष्ट तर्क दिया गया कि जब पिता के पास पहले से प्रामाणिक और वैध जाति प्रमाण पत्र मौजूद है, तो केवल 1950 का दस्तावेज न होने के आधार पर बच्चों को उनके अधिकार से वंचित करना पूरी तरह से अनुचित है।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने अफसरों की कार्यशैली पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने आदेश दिया कि 60 दिनों की समय-सीमा के अंदर संबंधित अधिकारी सभी औपचारिकताएं पूरी कर आगामी 60 दिनों के भीतर आवेदकों को जाति प्रमाण पत्र जारी करें।

पुराने नियमों का अड़ंगा खत्म :
यदि परिवार का मुख्य प्रमाण पत्र वैध है, तो हर पीढ़ी से 1950 के पुराने रिकॉर्ड मांगना तर्कसंगत नहीं है।
फैसले का आम जनता पर कैसा पड़ेगा असर?
हाई कोर्ट का यह फैसला उन हजारों युवाओं और विद्यार्थियों के लिए नज़ीर बनेगा जो शैक्षणिक प्रवेश, छात्रवृत्ति और सरकारी नौकरियों के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाने में 1950 के रिकॉर्ड की अनिवार्यता के कारण दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर थे। इस आदेश से अब प्रशासनिक प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और आवेदकों को अनावश्यक मानसिक उत्पीड़न से राहत मिलेगी।