फर्जी दस्तावेज़ से जमीन हड़पने का आरोप-भाजपा जिलाध्यक्ष और पूर्व एडीसीपी पर सवालों की बौछार

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मीनेश चन्द्र मीना
हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख

जोधपुर। चौखा गांव के किसान मोहनराम द्वारा दायर एक परिवाद ने जोधपुर की राजनीति और पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसान का आरोप है कि भाजपा जिलाध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल, एक प्रॉपर्टी डीलर और उनके साथियों ने मिलकर फर्जी दस्तावेजों के जरिए उसकी कृषि भूमि हड़पने की साजशि रची। और सबसे चौंकाने वाली बात-इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन एडीसीपी निशांत भारद्वाज पर भी मिलीभगत का आरोप लगाया गया है।



1996 में मरा व्यक्ति 1998 में जिंदा हुआ >>>

मोहनराम के अनुसार उसकी 23 बीघा 10 बिस्वा कृषि भूमि चौखा में स्थित है। इसी भूमि को हथियाने के लिए 1998 का एक फर्जी बेचान एग्रीमेंट बनाया गया। दस्तावेज़ में उनके बड़े पिता नारायणराम के हस्ताक्षर और अंगूठा निशान दिखाए गए, जबकि नारायणराम का निधन 1996 में ही हो चुका था। इतना ही नहीं, जिस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर बताए गए, उसमें कंप्यूटर लिपि (फॉन्ट) का उपयोग हुआ, जबकि 1998 में ग्रामीण स्तर पर ऐसे तकनीकी संसाधन आम तौर पर उपलब्ध ही नहीं थे।

यह गंभीर विसंगति होने के बावजूद पुलिस ने न तो दस्तावेज़ की एफएसएल जांच करवाई और न ही इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाए।
उल्टा, इसी संदिग्ध कागज़ के आधार पर किसान और उसके परिवार के खिलाफ चार्जशीट पेश कर दी गई।

उल्टा, इसी संदिग्ध कागज़ के आधार पर किसान और उसके परिवार के खिलाफ चार्जशीट पेश >>>

किसान का आरोप है कि उस समय मामले की जांच तत्कालीन एडीसीपी निशांत भारद्वाज ने की। उन्होंने भाजपा जिलाध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल और अन्य आरोपियों के पक्ष में काम किया। यही कारण है कि अदालत ने अब सीधे आरोपी नंबर 10 के तौर पर पूर्व एडीसीपी भारद्वाज से ही रिपोर्ट तलब की है।

अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या 6 ने पहले ही इस मामले की जांच उदयमंदिर थाने को सौंप दी थी।
अब अदालत ने एडीजे के आदेशों का अवलोकन करते हुए पूर्व एडीसीपी से घटनाक्रम पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 तारीख को निर्धारित की गई है।

फर्जी दस्तावेज़ पर जांच क्यों नहीं हुई >>>

मृतक व्यक्ति के नाम से बने दस्तावेज को गंभीरता से जांचने की बजाय पुलिस ने उसी को आधार बनाकर किसान के खिलाफ कार्रवाई क्यों की? एफएसएल जांच क्यों टाली गई? ऐसे संवेदनशील मामलों में दस्तावेज़ की वैज्ञानिक जांच अनिवार्य होती है। फिर इसे क्यों नज़रअंदाज़ किया गया?

राजनीतिक दबाव का असर? जब आरोप सीधे भाजपा जिलाध्यक्ष पर हैं, तो क्या पुलिस पर राजनीतिक दबाव बना? पुलिस अधिकारी की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न अदालत द्वारा पूर्व एडीसीपी से रिपोर्ट मांगना यह संकेत है कि उनकी भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है।

जिलाध्यक्ष चुप, किसान परेशान इस पूरे घटनाक्रम में किसान लगातार अदालत के चक्कर काट रहा है। उसने साफ़ आरोप लगाया है कि आरोपी पक्ष ने उसे और उसके परिवार को झूठे मुकदमों में फँसाकर दबाव बनाने की कोशिश की।

मीडियाकर्मियों ने भाजपा जिलाध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल का पक्ष जानना चाहा, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया >>>

यह मामला केवल जमीन विवाद का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा है। जब मृत व्यक्ति के नाम पर दस्तावेज़ तैयार हों, कंप्यूटर लिपि जैसी विसंगतियाँ साफ दिखें और फिर भी जांच अधिकारी उन्हीं दस्तावेज़ों को आधार बना लें, तो सवाल उठना लाज़मी है कि क्या न्याय व्यवस्था सचमुच गरीब किसान की रक्षा कर पा रही है, या फिर सत्ता और पद का इस्तेमाल करके कानून को अपने हिसाब से मोड़ा जा रहा है?

9 सितंबर की अगली सुनवाई में यह साफ होगा कि अदालत किस दिशा में कदम उठाती है, लेकिन इतना तय है कि इस प्रकरण ने पुलिस और राजनीति की साख पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

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