मीनेश चन्द्र मीना
हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख
जयपुर। किसानों के कई वर्षों के आंदोलनों के बाद भारत में फसल बीमा योजना का शुभारंभ हुआ। लेकिन किसान बेचारा टुकर टुकर देखता रह गया और भारत में काले कारनामें करने वालों की फौज ने ऐसा कबाड़ा कर दिया जिससे न केवल किसानों के धोखा हुआ अपितु बीमा कंपनीयों को भी बेजा चपेट लगी। इसलिए बीमा कंपनियां अब सावचेत हो गई।

एआई के इस्तेमाल से हो रहा है फर्जीवाड़े का खुलासा >>>
वर्तमान समय में एआई का ऐसा दौर शुरू हुआ है जिसके कारण अब खेतीबाड़ी में अब मौसम से लेकर रोग लगने की आशंका और अनुमान एआई बताने लगी है। इसी तरह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में बीमा करने वाली कंपनियां भी अब एआई का इस्तेमाल बीमा पॉलिसी के लिए कर रही हैं। इससे कई जगह फर्जीवाड़े का खुलासा हो रहा है। श्रीगंगानगर, अलवर और बूंदी जिले में बीमा कंपनी क्षेमा ने एआई और सैटेलाइट इमेज की मदद से करीब सवा दो लाख फर्जी बीमा क्लेम पकड़े हैं।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत दो लाख इक्कीस हजार छ: सौ इकसठ फर्जी आवेदक >>>
गौरतलब है कि इन क्लेम में खेतों में बताई गई फसल की जगह खाली मिली या दूसरी फसलें थीं। कंपनी ने श्रीगंगानगर, अलवर और बूंदी में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दावों में किसानों को 423 करोड़ रुपए का भुगतान भी किया मगर इस दौरान आवेदनों की जांच में केवल खरीफ 2025 सीजन में ही 221661 आवेदन फर्जी पाए। इन सभी आवेदनों के दावों को कंपनी ने अस्वीकार कर दिया है। इतने आवेदनों पर केंद्र और राज्य सरकार से दी जाने वाली सब्सिडी के रूप में 30.17 करोड़ रुपए खर्च होते।
वहीं, रबी 2024-25 सीजन के लिए स्मार्ट सैंपलिंग तकनीक पर आधारित क्रॉप कटिंग प्रयोग के गलत क्रियान्वयन को चुनौती दी है। क्रॉप कटिंग प्रक्रिया में सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया। चीफ रिस्क ऑफिसर कुमार सौरभ ने बताया कि तकनीक का उपयोग वास्तविक किसानों को लाभ पहुंचाना है। हमने श्रीगंगानगर जिले की करणपुर तहसील में 79 करोड़ के बीमा दावों का भुगतान किया है। मगर एआई के विश्लेषण में फर्जी पाए गए आवेदन स्वीकार नहीं कर सकते।

एआई द्वारा हर तस्वीर को स्कैन से खुलासा हुआ काले कारनामों का >>>>
सैटेलाइट चित्रों और एआई इनपुट्स के उपयोग से ऐसी गड़बड़ियों पर रोक लगाई है। जांच में यह सामने आया है कि जहां खेत में फसल बोई ही नहीं गई हो, वहां भी बीमा आवेदन किए या आवेदन पत्र में दर्ज फसल और वास्तविक बोई गई फसल में अंतर मिला। एआई हर तस्वीर को स्कैन करती है। रंग, आकार, बनावट और पैटर्न में अंतर देखकर भूमि की श्रेणी के अनुसार चिह्नित करती है। खेती की जमीन, पानी, पेड़, मकान, सड़क हो या अन्य निर्माण एआई से मैपिंग हो जाती है। इसके बाद सैटेलाइट इमेज एक्स्पर्ट और कृषि विशेषज्ञ इसकी समीक्षा करते हैं।
बीमा कंपनीयों तीन स्तर पर जांच के बाद कर रही है आवेदन खारिज >>>
बीमा कंपनियां तीन स्तर पर बीमा आवेदनों की जांच कर रही हैं। जिसमें आवेदन में दी गई जानकारी और सरकारी रिकॉर्ड से मिलान करना, मौके पर जाकर जीपीएस लोकेशन की पुष्टि और फोटो लेने के साथ एआई और सेटेलाइट रिमोट सेंसिंग तक का इस्तेमाल करना शामिल है। सैटेलाइट इमेज में जहां फसल है, उस स्थान को हरा दिखाया। जा रहा और जहां खाली जगह है, वहां ग्रे दिखाया जाता है। जिन खाली खसरों के लिए फसल बीमाआवेदन किए गए, उन्हें लाल रंग में मार्क किया जा रहा है।