मुख्यमंत्री के चुनावी क्षेत्र में लोगों ने खोला मोर्चा : पहले नियमन, फिर मतदान

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मीनेश चंद्र मीना
हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख

जयपुर। मुख्यमंत्री के चुनावी क्षेत्र सांगानेर और बगरू विधानसभा क्षेत्र में रविवार को आयोजित एक विशाल महापंचायत ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक तंत्र में हलचल मचा दी। वर्षों से नियमन की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे 86 कॉलोनियों के निवासियों ने सरकार को दो टूक संदेश देते हुए “नियमन नहीं तो वोट नहीं” का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया। हजारों लोगों की मौजूदगी में गूंजे इस नारे ने साफ संकेत दे दिए हैं कि अब मामला केवल फाइलों और अदालतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह लाखों नागरिकों के अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई बन चुका है।

लोगों का दर्द, आवासीय प्लाटों का नियमन नहीं होना

गौर तलब है कि महापंचायत में उपस्थित लोगों का दर्द उस समय छलक उठा जब उन्होंने अपने जीवनभर की कमाई से बनाए गए आशियानों पर मंडरा रहे संकट का जिक्र किया। लोगों ने कहा कि उन्होंने सरकार द्वारा पंजीकृत गृह निर्माण सहकारी समितियों से विधिवत भूखंड खरीदे, परिवार का पेट काटकर किश्तें भरीं, सपनों का घर बनाया और दशकों तक इन्हीं बस्तियों में अपना जीवन बसाया। आज वही परिवार अपने घरों के भविष्य को लेकर असुरक्षा और चिंता में जीने को मजबूर हैं।



पिछले 35 से 40 वर्षों से आबाद

सभा में वक्ताओं ने कहा कि विवादित बताई जा रही ये 86 कॉलोनियां कोई नई या अस्थायी बस्तियां नहीं हैं। ये कॉलोनियां भूमि अवाप्ति से पहले अथवा अवाप्ति प्रक्रिया के दौरान विकसित हो चुकी थीं और पिछले 35 से 40 वर्षों से आबाद हैं। वर्तमान में इनका विकास 80 से 100 प्रतिशत तक पूर्ण हो चुका है। यहां स्कूल हैं, बाजार हैं, मंदिर हैं, सड़कें हैं और हजारों परिवारों की पीढ़ियां बस चुकी हैं।

सरकारी सुविधाएं, फिर भी नियमन नहीं

महापंचायत में सबसे तीखा सवाल सरकार से पूछा गया कि जब इन कॉलोनियों में वर्षों पहले बिजली, पानी, सीवरेज, सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा दी गईं, तब अब यहां रहने वाले लोगों को अनिश्चितता और भय के माहौल में क्यों धकेला जा रहा है? लोगों का कहना था कि सरकार ने सुविधाएं देकर इन बस्तियों को व्यवहारिक रूप से स्वीकार किया, लेकिन नियमन के मुद्दे पर अब तक निर्णायक कदम नहीं उठाया गया।

सरकार ने न्यायालय से तथ्य छुपाए

सभा में न्यायालय के अंतरिम आदेश को लेकर भी चर्चा हुई। संघर्ष समिति के नेताओं ने दावा किया कि यह आदेश कथित रूप से बिना दूसरे पक्ष को सुने पारित हुआ है और लाखों नागरिकों के व्यापक जनहित से जुड़े तथ्यों पर पर्याप्त विचार नहीं हो सका। उन्होंने मांग की कि सरकार उच्च न्यायालय के समक्ष वास्तविक स्थिति, रिकॉर्ड और जनता के हितों को मजबूती से रखे तथा अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग कर लोगों को राहत प्रदान करे।

8 मार्च 2026 को निकाला गया विशाल पैदल मार्च

नियमन हेतु संघर्ष समिति के अध्यक्ष रघुनन्दन सिंह हाड़ा, महामंत्री परशुराम चौधरी और कोषाध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि संघर्ष समिति ने हमेशा लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से जनता की आवाज उठाई है। 8 मार्च 2026 को निकाला गया विशाल पैदल मार्च भी इसी संघर्ष का हिस्सा था। उस समय उम्मीद थी कि सरकार जनता की पीड़ा को समझेगी और समाधान का रास्ता निकालेगी, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया।



नियमन नहीं तो वोट नहीं

यही कारण है कि अब जनता ने राजनीतिक चेतावनी का रास्ता चुना है। महापंचायत में लिए गए निर्णय के बाद विभिन्न कॉलोनियों में “नियमन नहीं तो वोट नहीं” के बैनर लगा दिए गए हैं। यह अभियान तेजी से जनआंदोलन का रूप लेता दिखाई दे रहा है। लोगों का कहना है कि जब तक उनके आशियानों की सुरक्षा और नियमन सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक वे चुनावी प्रक्रिया में अपनी नाराजगी दर्ज कराएंगे।

डेढ़ से दो लाख नागरिकों की रिहायशी

महापंचायत में मौजूद हजारों लोगों ने सरकार को स्पष्ट अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि लगभग डेढ़ से दो लाख नागरिकों को शीघ्र राहत नहीं मिली, तो आंदोलन को और अधिक उग्र एवं व्यापक बनाया जाएगा। इसके तहत विशाल पैदल मार्च, कैंप कार्यालयों का घेराव, मुख्यमंत्री आवास का घेराव, टोंक रोड पर अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन और प्रदेशव्यापी जनआंदोलन की रणनीति पर विचार किया जा रहा है।

हमारे घर बचाओ, हमारा भविष्य बचाओ

सभा स्थल पर महिलाओं, बुजुर्गों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ मौजूद रही। लोगों ने हाथों में तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ जोरदार नारे लगाए। पूरे वातावरण में एक ही संदेश बार-बार सुनाई दे रहा था—“हमारे घर बचाओ, हमारा भविष्य बचाओ।”

जीवन की गाढ़ी कमाई से बनाया घर

महापंचायत का यह फैसला अब केवल 86 कॉलोनियों का मुद्दा नहीं रह गया है। यह उन लाखों लोगों की पीड़ा की कहानी बन गया है, जिन्होंने अपने जीवन की गाढ़ी कमाई से घर बनाए और अब अपने ही आशियानों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जनता का कहना है कि उन्हें आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए; बयान नहीं, निर्णय चाहिए।

अब निगाहें सरकार और प्रशासन पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार लाखों लोगों की इस पुकार को सुनकर राहत का रास्ता निकालेगी, या फिर राजस्थान की राजधानी से उठी यह चिंगारी आने वाले दिनों में एक बड़े जनांदोलन की आग में बदल जाएगी?

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