मीणा को वर्दी का रौब दिखाना पड़ा भारी : न्यायालय के आदेश पर थानाधिकारी, डीएसपी समेत पुलिस अफसरों पर मामला दर्ज

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मीनेश चंद्र मीना
हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख

जयपुर ग्रामीण/शाहपुरा।  न्याय व्यवस्था में विश्वास रखने वाले एक आदिवासी परिवार की लंबी कानूनी लड़ाई उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंची जब अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण मामलों की विशेष अदालत के आदेश पर शाहपुरा थाने में तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। मामला अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है और पुलिस कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।



मामला शाहपुरा थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां अनुसूचित जनजाति वर्ग के सज्जन मीणा निवासी ढाणी ढिगार, ग्राम बागावास चौरासी, तहसील विराटनगर ने आरोप लगाया कि तत्कालीन थानाधिकारी हेमराज सिंह गुर्जर, तत्कालीन वृत्ताधिकारी मुकेश चौधरी तथा एसआई गंगाराम सहित अन्य व्यक्तियों ने उनके खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र रचकर न केवल अवैध हिरासत में रखा बल्कि बाद में एक चोरी के मामले में झूठा फंसाकर उन्हें महीनों तक जेल में रहने को मजबूर कर दिया।

आठ दिन तक अवैध हिरासत में रखने का आरोप **

परिवाद के अनुसार 27 सितम्बर 2025 को सज्जन मीणा को उनके खेत से पुलिसकर्मी उठाकर शाहपुरा थाने ले गए। आरोप है कि कई दिनों तक न तो परिवार को उनकी गिरफ्तारी की सूचना दी गई और न ही उन्हें नियमानुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया।

परिवार के लोगों ने जब उच्च पुलिस अधिकारियों, मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तक शिकायतें भेजीं, तब भी उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिली। परिवाद में आरोप लगाया गया कि इस दौरान पुलिस ने परिवार को गुमराह किया और हिरासत की वास्तविक स्थिति छिपाई।

शिकायतों की रंजिश में झूठे मुकदमें में फंसाने का आरोप ***

परिवादी का दावा है कि अवैध हिरासत की शिकायतों से नाराज होकर संबंधित अधिकारियों ने व्यक्तिगत रंजिश के चलते गोविन्दपुर विद्यालय की लैब से कम्प्यूटर चोरी के मामले में उन्हें आरोपी बना दिया। जबकि पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार कथित चोरी का माल तो 12 सितम्बर 2025 को ही बरामद दिखाया गया था।

परिवाद में कहा गया है कि न तो कोई सीसीटीवी फुटेज, न मोबाइल लोकेशन, न कॉल रिकॉर्ड और न ही कोई वैज्ञानिक साक्ष्य उनके खिलाफ मौजूद था, फिर भी उन्हें आरोपी बनाकर जेल भेज दिया गया। इतना ही नहीं, उनकी रोजी-रोटी का मुख्य साधन पिकअप वाहन भी जब्त कर लिया गया।

पीडित सज्जन कुमार मीणा



दो महीने से अधिक जेल में रहा परिवार का सहारा***

आरोप है कि केस डायरी में भ्रामक तथ्यों का उल्लेख कर अधीनस्थ न्यायालयों से जमानत प्रभावित करने का प्रयास किया गया। परिणामस्वरूप सज्जन मीणा को दो महीने से अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा। बाद में राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर पीठ से जमानत मिलने के बाद 1 दिसम्बर 2025 को उन्हें रिहा किया गया।

इस दौरान उनकी अशिक्षित पत्नी, तीन नाबालिग बेटियां और दो नाबालिग बेटे मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संकट से गुजरते रहे। परिवार की आजीविका प्रभावित हुई, बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई और लाखों रुपये कानूनी प्रक्रिया में खर्च होने का दावा किया गया है।

कोर्ट ने माना मामला गंभीर, दर्ज हुई FIR***

मामले की सुनवाई के दौरान विशेष न्यायाधीश अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण प्रकरण, जयपुर ग्रामीण ने परिवाद में लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया गंभीर मानते हुए कार्रवाई के आदेश दिए।

न्यायालय के निर्देशों के बाद शाहपुरा थाने में एफआईआर संख्या 206/2026 दर्ज की गई। एफआईआर में एससी/एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराएं भी शामिल की गई हैं। मामले की जांच वर्तमान वृत्ताधिकारी शाहपुरा को सौंपी गई है।

क्या पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही तय होगी ?

यह मामला केवल एक व्यक्ति की पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रश्न को भी सामने लाता है कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को पद और शक्ति के दुरुपयोग के माध्यम से झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भेजा जाता है तो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक नुकसान और मानसिक पीड़ा की भरपाई कौन करेगा?

हालांकि पुलिस विभाग में अनेक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी कार्यरत हैं, लेकिन ऐसे आरोप पूरे विभाग की छवि को प्रभावित करते हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से पूरी होती है या नहीं तथा पीड़ित को न्याय मिल पाता है या नहीं।

गौरतलब है कि फिलहाल पुलिस अफसरों पर FIR दर्ज हो चुकी है और जांच जारी है। जांच के निष्कर्ष आने के बाद ही आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण हो सकेगा। इसलिए आप नियमित रूप से जोरदार समाचारों के लिए हैलो सरकार से जुड़े रहे।

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