संविधान के मूल ढांचे को लेकर गहलोत का भाजपा-आरएसएस पर तंज, होसबले के बयान को बताया खतरनाक संकेत

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मीनेश चन्द्र मीना
हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख

जयपुर।

गहलोत ने कहा कि बार-बार ऐसे बयान देकर देश के सामाजिक ताने-बाने को छेड़ने और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को चुनौती देने वालों पर अदालत को स्वत-संज्ञान लेते हुए अवमानना की कार्रवाई करनी चाहिए। ताकि कोई भी व्यक्ति या संगठन संविधान से ऊपर होने का दुस्साहस न कर सके।


सुप्रीम कोर्ट से ऊपर स्वयं को मानकर दे रहे हैं ऐसे बयान >>>

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर संविधान विरोधी मानसिकता रखने का आरोप लगाते हुए उन्हें कठघरे में खड़ा किया है। गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले के संविधान की प्रस्तावना में बदलाव संबंधी बयान को संविधान विरोधी सोच का खुला प्रमाण बताया। गहलोत ने लिखा कि पिछले दो दिन से संविधान की रक्षक होने का नाटक कर रही क्च्छुक्क रस की असली मंशा दत्तात्रेय होसबले के बयान से सामने आ गई है। इन संगठनों का उद्देश्य हमेशा से संविधान को बदलना रहा है। अब ये सुप्रीम कोर्ट से ऊपर स्वयं को मानकर ऐसे बयान दे रहे हैं जो न्यायपालिका की अवमानना की श्रेणी में आते हैं। पिछले दो दिन से संविधान की रक्षक होने का नाटक कर रही संविधान विरोधी सोच दत्तात्रेय होसबले के संविधान की प्रस्तावना में बदलाव के बयान से उजागर होती है। इनका उद्देश्य हमेशा से संविधान बदलने का रहा है। गहलोत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की संविधान बचाओ मुहिम को उचित ठहराते हुए कहा कि उनकी सोच और प्रयास संविधान के मूल स्वरूप को बदलने के हैं। उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में स्पष्ट किया था कि पंथनिरपेक्षता और समाजवाद भले ही मूल संविधान में लिखित नहीं थे, लेकिन वे संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं। उन्होंने आगे बताया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1976 में इन दोनों शब्दों को 42वें संशोधन के जरिए प्रस्तावना में शामिल किया था, जिसे मिनर्वा मिल्स केस (1980) में सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया। इसके अलावा एस.आर. बोमई बनाम भारत सरकार (1994) और हाल ही के बलराम सिंह केस (2024) में भी शीर्ष अदालत ने पंथनिरपेक्षता एवं समाजवाद को संविधान के मूल तत्व माना।

स्वत: संज्ञान लेते हुए अवमानना की कार्रवाई >>>

गहलोत ने कहा, बार-बार ऐसे बयान देकर देश के सामाजिक ताने-बाने को छेड़ने और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को चुनौती देने वालों पर अदालत को स्वत- संज्ञान लेते हुए अवमानना की कार्रवाई करनी चाहिए। ताकि कोई भी व्यक्ति या संगठन संविधान से ऊपर होने का दुस्साहस न कर सके।

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