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नरेंद्र मोदी

 

 

नोटा की हवा से खराब हुई राजनीतिक दलों की हालत

चार राज्यों के लिए अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में यदि सभी दल सबसे ज्यादा नोटा से डर रहे हैं तो यह बेवजह नहीं है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में आरक्षण को लेकर गुस्से में नोटा को वोट देने की अपील की जा रही है। इस बार छत्तीसगढ़ में बसपा के अजीत जोगी की जनता कांग्रेस से हुए तालमेल से लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है, इसलिए माना जा रहा है कि जीत-हार का अंतर बहुत कम रहने वाला है।

राजस्थान व मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस का बसपा से तालमेल नहीं हो पाया, तो वहां भी लड़ाई त्रिकोणीय होगी। तेलंगाना में भी भाजपा, टीआरएस और टीडीपी-कांग्रेस गठबंधन के बीच तिकोना मुकाबला ही है। ऐसे में जीत-हार में नोटा की भूमिका अहम होगी।

पिछले चुनाव के नतीजे भी इसी ओर इशारा करते हैं। छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों में से 45 पर नोटा तीसरे स्थान पर था। राजस्थान की 200 सीटों में से 145 पर पहले पांच स्थानों में था। इसी तरह मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में 190 पर नोटा पहले पांच स्थानों में था। इन तीनों राज्यों में जदयू, एनसीपी, भापका-माकपा और सपा जैसे दलों को नोटा से कहीं कम वोट मिले।

ऐसा भी हुआ

छत्तीसगढ़ की कवर्धा सीट पर नोटा को 9229 वोट मिले और कांग्रेस उम्मीदवार अकबर अहमद केवल 2858 वोटों के अंतर से हार गया। कांग्रेस नेताओं का कहना था कि उनके उम्मीदवार का नाम ईवीएम में पहले स्थान पर था, लेकिन उनके समर्थकों में से कई ने नीचे से पहले स्थान (नोटा) पर बटन दबा दिया।

आरएसएस भी नोटा के खिलाफ
आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी हाल ही में नोटा को वोट न देने की अपील की थी, क्योंकि उनके अनुसार यह अपने मताधिकार को गंवाना है। उनका कहना था कि नोटा की वजह से सर्वोत्तम को भी खारिज कर दिया जाता है और इसका फायदा बुरे लोग उठा लेते हैं। 

 

 

 

 

 

 

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