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नरेंद्र मोदी

 

 

गौमाता की सेवा से भारत सोने की चिड़िया बना

 

लेखक
कजोड़ मल मीना, एडवोकेट, राजस्थान उच्च न्यायालय जयपुर।
  सोने की चिड़िया का लोहा मनवा चुका भारत पूरे विश्व में अकूत संपदा के कारण अपनी पहचान बनाई। प्राचीन काल में भारत को सोने की चिड़िया इसलिए कहा जाता था, क्योंकि भारत में अकूत धन सम्पदा मौजूद थी। 1600 ईस्वी के आस-पास भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 1305 अमेरिकी डॉलर थी, जो कि उस समय अमेरिका, जापान, चीन और ब्रिटेन से कई गुना अधिक थी। भारत की यह अकूत संपत्ति ही विदेशियों के आक्रमणों का कारण बना। आजकल लोग व्हाट्सएप, टि्वटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसी सोशल साइट्स पर अनर्गल बातें करते रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि हम अपने नैतिक कर्तव्य एवं दायित्वों की जिम्मेदारियों से बचकर भाग रहे हैं। कभी इस बात का चिंतन करो, आखिर साइंस और टेक्नोलॉजी के आधुनिक युग की इक्कीसवीं सदी में भी भारत पुनः " सोने की चिड़िया " का ताज क्यों नहीं पहन सका ? जबकि प्राचीन काल में भारत अकाल और राशियों का प्राकृतिक त्रासदियों का शिकार होता आ रहा है। फिर भी भारत अकूत संपदा का स्वामी रहा। जबकि वर्तमान लोकतांत्रिक सरकारों के सामने छोटी सी प्राकृतिक आपदा आ जाने से प्रशासनिक व्यवस्था डावांडोल हो जाती है। प्राचीन काल में भारत के लोग इस कारण से प्राकृतिक आपदा एवं अकाल से भयभीत नहीं होता था क्योंकि उनके पास पशुधन के रूप में गौमाता का मजबूत आसरा था। प्राचीन समय में भारत के लोग गौ माता को परसों नहीं मानकर एक माता का दर्जा देकर पूजा किया करते थे। जब कभी भी प्राकृतिक आपदा का सामना होता था, तो गौमाता के दूध, दही, घी से आदमी भुखमरी का शिकार नहीं होता था। गौ के गोबर एवं नंदियो से जमीन की गहरी जुताई करने पर किसानों को भरपूर पैदावार होती थी। गाय के गोबर एवं मूत्र से जमीन में सदा नमी बनी रहती हैं, जिससे ना तो फसल में रोग लगता और ना ही फसल को अधिक सिचाई की जरूरत होती हैं। इसी वजह से खेतों में आज के मुकाबले ज्यादा उत्पादन होता था। उसी पैदावार को दूसरे देशों में निर्यात करने पर माल के बदले मूल्य के रूप में सोना या चांदी मिलते थे। उसी सोना-चांदी से भारत विश्व में सोने की चिड़िया के नाम से विख्यात हुआ। इस प्रकार भारत गौवंश के कारण ही अपने सिर पर " सोने की चिडिया " का ताज पहना। यद्यपि गौओं के बारे में शास्त्रों में भी बहुत उल्लेख मिलता है। महाभारत के अध्याय 81 का श्लोक 33 में बताया गया हैं कि –
  " गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः।
  तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान् ॥
  अर्थात जो मनुष्य गौओं की सेवा करता है , उसे गौएँ अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं । "
  ठीक इसी प्रकार महाभारत के अध्याय 83 का श्लोक 50 से 52 में बताया गया हैं कि –
  " गोषु भक्तश्च लभते यद् यदिच्छति मानवः ।
  स्त्रियोऽपि भक्ता या गोषु ताश्च काममवाप्नुयुः ॥
  पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी तामवाप्नुयात् ।
  धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् ।।
  विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम् ।
  न किञ्चिद् दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत ।।
  अर्थात वह गौभक्त मनुष्य पुत्र , धन , विद्या , सुख आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है , वह सब उसे प्राप्त हो जाती है। उसके लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होती। "
  मानव विज्ञान जगत की कितनी ही बुलंदियों को छूले, लेकिन हर धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं लोक परंपराओं में शास्त्रों का सहारा लेकर सामाजिक व्यवस्थाओं को अपनाता है। चाहे वह टेवा हो या कोई मुहूर्त हो अथवा सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण से संबंधित भविष्यवाणियां। उन सभी में शास्त्रों का सहारा लिया जाता है। कुछ अज्ञानी लोग होते हैं जो शास्त्रों को एक दंतकथा के रूप में समझते हैं।
  मानव किसी भी कार्य को बिना शास्त्र विधि के नहीं करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवतगीता के 16वें अध्याय के शलोक 23 व 24 में बड़े सुंदर ढंग से स्पष्ट शब्दों में कहा है :—
  " य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
   न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
    तस्माच्छास्त्र प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
     ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥
      अर्थात जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है , वह न सिद्धि (अन्त:करण की शुद्धि) - को, न सुख (शान्ति) - को और न परमगति को ही प्राप्त होता है। अतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है - ऐसा जानकर तू इस लोक में शास्त्रविधि से नियत कर्तव्य-कर्म करने योग्य है अर्थात् तुझे शास्त्रविधि के अनुसार कर्तव्य-कर्म करने चाहिये। "
      आज की चमक-दमक की जिंदगी की चकाचौंध में मानव इस कदर फस गया कि उसे शास्त्र के बारे में सोचने का नजरिया ही बदल गया। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जब से मानव जाति गौ माता का अहित सोचने लगा हैं, तभी से मानव की दुर्गति की रफ्तार तेजी से बढ़ी है। आज का इंसान कोई तन से दुःखी है, कोई मन से दुःखी है, कोई परिवार से दुःखी है, कोई राजनीति से दुःखी है, कोई समस्याओं से दुःखी है, कोई मान-अपमान से दुःखी है, क्योंकि जब तक गौमाता की दुर्दशा होती रहेगी तब तक है, मानव की हालात बद से बदतर होते रहेंगे।
      पाश्चात्य देशों की संस्कृति अपनाने के चक्कर में भारतीय समाज के लोग अपने अस्तित्व को भी भूलते जा रहे हैं। शायद उन लोगों को इस बात का भी पता नहीं है कि भारत सोने की चिड़िया के साथ-साथ विश्व गुरु का दर्जा भी प्राप्त कर रखा है। जो धीरे-धीरे लुप्त प्राय होता जा रहा है।

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